• Sun. Mar 29th, 2026

पिरान कलियर में बसती है मस्तमलंगों की एक अलग ही दुनिया, इनके धमाल को देखकर हर कोई दबाता है दांतो तले उंगलीयां

Byakeel ahmad

Oct 17, 2022

भारत दुनिया का इकलौता ऐसा देश हैं जहां आस्था, श्रद्धा और विश्वास की त्रिवेणी का संगम न केवल शहरों बल्कि गांव देहातों में देखा जाता है, हरिद्वार धर्म और आध्यात्म की ऐसी अनुपम नगरी हैं जहां नित दिन अधिकांष आश्रमों से धर्म और आध्यात्म आधारित उपदेश गूंजते हैं, तो पिरान कलियर से सूफियों के मानव कल्याण का संदेश देते प्रवचन सुनाई देते है।

बताते चलें कि रुड़की से 7 किलो मीटर की दूरी पर बसी सूफ़ी संतो नगरी पिरान कलियर में एक अलग ही दुनिया बस्ती है, जिन्हें मस्तमलंगों की दुनिया कहा जाता है, दरअसल ये मस्तमलंग दुनियावी रीतिरिवाज से बिल्कुल अलग होते है, ना परिवार ना कोई ख्वाहिश और ना ही कोई चाहत, बस अपनी ही धुन और अपनी ही दुनिया में खोए ये मस्तमलंग दुनियां भर में बसे है, दुनियांभर में मज़ारो पर इन मस्तमलंगो का डेरा होता है, बस यही वो स्थान है जहां उनका घरबार और सब कुछ यही है, पिरान कलियर भी उन स्थानों में एक है, बता दें, पिरान कलियर में चार धुनें रजिस्ट्रड है, चारो धुनों पर सैकड़ो मस्तमलंग रहते है जो ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ को अंजाम देते है।

इन दिनों पिरान कलियर स्थित विश्व प्रसिद्ध दरगाह हजरत मखदूम अलाउद्दीन अली अहमद साबिर पाक का सालाना उर्स चल रहा है, उर्स में शिकरत करने आए दूर दराज से मस्तमलंग कलियर स्थित डेरो पर आशिकी में लीन है, रफाई धुनें के बाबा ने बताया कि उनको मजार शरीफ में आराम फरमा सूफ़ीओं से सच्ची मुहब्बत है, और उन्ही के इश्क में वह दुनियां भुलाए है, बाबा बताते है कि धुनों पर मौजूद मस्तमलंगो की ग़िज़ा चिलम है, हालांकि ये सेहत के लिए हानिकारक होती है, बावजूद इसके वो इसे अपनी ग़िज़ा मानते है, वो बताते है की यदि तीन दिन उन्हें खाना ना दिया जाए तो उनपर कोई फर्क नही पड़ेगा, बस चिलम के सहारे वो अपनी भक्ति में लीन रहते है।

वही आपको बता दे कि पिरान कलियर सुफिसन्तो की नगरी कहलाता है, क्योंकि यहां विश्व प्रसिद्ध सूफी हज़रत मखदूम अलाउद्दीन अली अहमद साबिर पाक की दरगाह है, दरगाह से अक़ीदत और सच्ची मुहब्बत रखने वाले लोग यहां आते है और अपनी बिड़गी बनाते है, कहते है दरबार में सच्चे दिल से जो मांगा जाता वो उसे हासिल होता है, दरबार-ए- साबिर पाक का प्रत्येक वर्ष सालाना उर्स मनाया जाता है जो इन दिनों चल रहा है, उर्स में दूर दराज से अकीदतमंद दरबार में हाजरी लगाते हैं और फैजियाब होकर लौटते है, इन्हीं अकीदतमंदों में एक फौज मस्तमलंगो की भी होती है, जिन्हें दरबार के अलावा और कोई धुन नही होती, ये मस्तमलंग अपने परिवारो को छोड़कर दरगाहों की शरण में रहते है और वही ख़िदमत को अंजाम देते है, मस्तमलंगो की दुनिया बेहद दिलचस्प होती है, इनके धमाल को देखकर हर कोई दांतो तले उंगली दबाने पर मजबूर हो जाता है, उर्स के दौरान ये मस्तमलंग धमाल (करतब) करते है जिसमे ये अपने ऊपर तलवार, हंटर आदि चीजो से वार करते हुए दिखाई देते हैं, इनका मानना है कि ये सब दरबार की सच्ची मुहब्बत का प्रमाण है, जिससे इनको कोई नुकसान नही पहुचता, वही अगर बात करे इनके जीवन यापन की तो बेहद सादा जीवन जीना और लोगो की मदद करना ही इनका मक़सद है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.